माँ मुझको ॐ-प्रकाश मिले, नित सद्भावों के सुमन खिलें.
वर ऐसा दो सत्मूल्यों के शुभ संस्कार किंचित न हिलें.
मम कलम विचारों वाणी को मैया अपना आवास करो-
मेर जीवन से मिटा तिमिर हे मैया अमर उजास भरो..
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बुधवार, 20 जनवरी 2010
सोमवार, 11 जनवरी 2010
सरस्वती वंदना : ३ संजीव 'सलिल'
सरस्वती वंदना : ३
संजीव 'सलिल'
*
हे हंसवाहिनी! ज्ञानदायिनी!
अम्ब विमल मति दे...
*
नाद-ब्रम्ह की नित्य वंदना.
ताल-थापमय सृजन-साधना.
सरगम कंठ सजे...
*
रुनझुन-रुनझुन नूपुर बाजे.
नटवर-चित्रगुप्त उर साजे.
रास-लास उमगे...
*
अक्षर-अक्षर शब्द सजाये.
काव्य-छंद, रस-धार बहाये.
शुभ साहित्य सृजे...
*
सत-शिव-सुन्दर सृजन शाश्वत.
सत-चित-आनंद भजन भागवत.
आत्म देव पुलके...
*
कंकर-कंकर प्रगटे शंकर.
निर्मल करें ह्रदय प्रयलंकर.
'सलिल' सतत महके...
*
संजीव 'सलिल'
*
हे हंसवाहिनी! ज्ञानदायिनी!
अम्ब विमल मति दे...
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नाद-ब्रम्ह की नित्य वंदना.
ताल-थापमय सृजन-साधना.
सरगम कंठ सजे...
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रुनझुन-रुनझुन नूपुर बाजे.
नटवर-चित्रगुप्त उर साजे.
रास-लास उमगे...
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अक्षर-अक्षर शब्द सजाये.
काव्य-छंद, रस-धार बहाये.
शुभ साहित्य सृजे...
*
सत-शिव-सुन्दर सृजन शाश्वत.
सत-चित-आनंद भजन भागवत.
आत्म देव पुलके...
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कंकर-कंकर प्रगटे शंकर.
निर्मल करें ह्रदय प्रयलंकर.
'सलिल' सतत महके...
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बुधवार, 6 जनवरी 2010
सरस्वती वंदना : २ --संजीव 'सलिल'
सरस्वती वंदना : २
संजीव 'सलिल'
*
हे हंसवाहिनी!, ज्ञानदायिनी!!
अम्ब विमल मति दे...
*
जग सिरमौर बने माँ भारत.
सुख-सौभाग्य करे नित स्वागत.
नव बल-विक्रम दे...
*
साहस-शील ह्रदय में भर दे.
जीवन त्याग-तपोमय कर दे.
स्वाभिमान भर दे...
*
लव-कुश, ध्रुव-प्रह्लाद हम बनें.
मानवता का त्रास-तम हरें.
स्वार्थ विहँस तज दें...
*
दुर्गा, सीता, गार्गी, राधा.
घर-घर हों, काटें हर बाधा.
सुख-समृद्धि सरसे...
*
नेह-प्रेम की सुरसरि पावन.
स्वर्गोपम हो राष्ट्र सुहावन.
'सलिल' निरख हरषे...
***
दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम
Acharya Sanjiv Salil
http://divyanarmada.blogspot.com/
संजीव 'सलिल'
*
हे हंसवाहिनी!, ज्ञानदायिनी!!
अम्ब विमल मति दे...
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जग सिरमौर बने माँ भारत.
सुख-सौभाग्य करे नित स्वागत.
नव बल-विक्रम दे...
*
साहस-शील ह्रदय में भर दे.
जीवन त्याग-तपोमय कर दे.
स्वाभिमान भर दे...
*
लव-कुश, ध्रुव-प्रह्लाद हम बनें.
मानवता का त्रास-तम हरें.
स्वार्थ विहँस तज दें...
*
दुर्गा, सीता, गार्गी, राधा.
घर-घर हों, काटें हर बाधा.
सुख-समृद्धि सरसे...
*
नेह-प्रेम की सुरसरि पावन.
स्वर्गोपम हो राष्ट्र सुहावन.
'सलिल' निरख हरषे...
***
दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम
Acharya Sanjiv Salil
http://divyanarmada.blogspot.com/
सोमवार, 28 दिसंबर 2009
गीत; अम्ब! विमल मति दे -संजीव 'सलिल'
गीत
संजीव 'सलिल'
अम्ब! विमल मति दे
*
हे हंस वाहिनी! ज्ञानदायिनी!!
अम्ब विमल मति दे.....
*
नन्दन कानन हो यह धरती।
पाप-ताप जीवन का हरती।
हरियाली विकसे.....
*
बहे नीर अमृत सा पावन।
मलयज शीतल शुद्ध सुहावन।
अरुण निरख विहसे.....
*
कंकर से शंकर गढ़ पायें।
हिमगिरि के ऊपर चढ़ जाएँ।
वह बल-विक्रम दे.....
*
हरा-भरा हो सावन-फागुन।
रम्य ललित त्रैलोक्य लुभावन।
सुख-समृद्धि सरसे.....
*
नेह-प्रेम से राष्ट्र सँवारें।
स्नेह समन्वय मन्त्र उचारें।
************************
संजीव 'सलिल'
अम्ब! विमल मति दे
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हे हंस वाहिनी! ज्ञानदायिनी!!
अम्ब विमल मति दे.....
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नन्दन कानन हो यह धरती।
पाप-ताप जीवन का हरती।
हरियाली विकसे.....
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बहे नीर अमृत सा पावन।
मलयज शीतल शुद्ध सुहावन।
अरुण निरख विहसे.....
*
कंकर से शंकर गढ़ पायें।
हिमगिरि के ऊपर चढ़ जाएँ।
वह बल-विक्रम दे.....
*
हरा-भरा हो सावन-फागुन।
रम्य ललित त्रैलोक्य लुभावन।
सुख-समृद्धि सरसे.....
*
नेह-प्रेम से राष्ट्र सँवारें।
स्नेह समन्वय मन्त्र उचारें।
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